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केंद्रीय बजट के सभी महत्व पूर्ण तथ्य



केंद्रीय बजट के सभी महत्व पूर्ण तथ्य 





भारत का केन्द्रीय बजट 1 फ़रवरी 2018 को रेल बजट के साथ वित्त मत्री द्वारा प्रस्तुत किया जाएगा. पहले केन्द्रीय बजट फ़रवरी महीने के अंतिम कार्यदिवस को अलग से प्रस्तुत किया जाता था तथा रेल बजट भी अलग से प्रस्तुत किया जाता था.
यहां हमने केन्द्रीय बजट की  उपरोक्त उल्लेखित बजट तथा बिल के साथ व्याख्या की है. हमने बजट के कथन तथा प्रस्तुतीकरण की व्याख्या करने के साथ साथ इससे जुड़े संवैधानिक प्रावधानों को विस्तृत रूप से समझाया है ताकि  छात्र बजट से जुडी सभी महत्वपूर्ण जानकारियों से अवगत हो सके.

बजट अवलोकन
भारत का संविधान में अनुच्छेद 112 के तहत केंद्रीय बजट को परिभाषित किया गया है. साथ ही यह सालाना वित्तीय कथन (एनुअल फाइनैंशियल स्टेटमेंट) के नाम से भी जाना जाता है. बजट एक वर्ष के दौरान सरकार के राजस्व और खर्च का अनुमान होता है. बजट आगामी वित्त वर्ष के लिए प्रस्तुत किया जाता है. प्रत्येक बजट में आगामी वर्ष के बजट के लिए वास्तविक आंकड़े, वर्तमान वर्ष के लिए संशोधित आंकड़े और बाद के वर्षों के लिए बजट का अनुमान होता है.
संविधान के अनुच्छेद 112 के अनुसार 1 अप्रैल से 31 मार्च के बीच चलने वाले प्रत्येक वित्त वर्ष के संदर्भ में संसद में केंद्र सरकार के अनुमानित खर्च का कथन प्रस्तुत किया जाना चाहिए. केंद्र सरकार ने संसद में 1 फरवरी 2017 को बजट प्रस्तुत करने का फैसला किया है. इससे पहले इसे फरवरी के अंत में पारित किया जाता था.

लोगों की श्रेणीउम्मीद
छात्र-
शिक्षण ऋण की ब्याज में कमी, फीस में कमी, शिक्षा आधारित  कुछ एफएमसीजी में कमी आदि
नौकरी पेशा वर्ग-
आयकर में कमी, सेवा कर में कमी आदि
व्यापारी वर्ग-
वैट, उत्पाद –शुल्क और सीमा– शुल्क में कमी, कॉरपोरेट टैक्स में कमी आदि
किसान-
बीजों और उर्वरकों में सब्सिडी, ऋण माफी आदि

बजट के घटक क्या हैं?
केंद्रीय बजट तीन हिस्सों में वर्गीकृत किया जाता है–

संचित निधि (Consolidated Fund): संचित निधि में सरकार को प्राप्त राजस्व और सरकार द्वारा किए जाने वाले खर्च (असाधारण मदों को छोड़कर) का विवरण होता है. इस निधि को भारत के संविधान के अनुच्छेद  266 (1) के तहत बनाया गया था. प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों के माध्यम से सरकार को मिलने वाले सभी राजस्व, उधार लिए गए पैसे और सरकार द्वारा दिए गए ऋण की प्राप्तियां भारत के संचित निधि में आती हैं. सरकार के सभी खर्च इस निधि से किया जाता है. इसमें आकस्मिकता निधि (Contingency Fund) या लोक लेखा (Public Account) से पूरा किए जाने वाले असाधारण मद शामिल नहीं हैं. संसद की मंजूरी के बिना इस निधि से पैसा निकालने की अनुमति नहीं है. 

लोक लेखा (Public Account): भारत का लोक लेखा उन लेनदेन के लिए बनाया गया है जिसमें सरकार महज एक बैंकर के तौर पर काम करती है. इस निधि की स्थापना संविधान के अनुच्छेद 266 (2) के तहत किया गया था.

आकस्मिकता निधि (Contingency Fund): आकस्मिकता निधि को सरकार के कुछ अति– आवश्यक खर्चों को पूरा करने के लिए अग्रदाय खाता (imprest account) के तौर पर बनाया गया था. इस निधि को सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 267 के तहत स्थापित किया था. आकस्मिकता निधि पर राष्ट्रपति का नियंत्रण होता है. इस निधि से किये जाने वाले किसी भी खर्च के लिए संसद से अनुमति लेनी होती है और निकाली गई धनराशि को संचित निधि में जमा करना होता है.

बजट कैसे तैयार किया जाता है? 
1. संसद की भूमिका
सरकार की भारतीय संसदीय प्रणाली वेस्टमिनिस्टर मॉडल पर आधारित है. संविधान लोगों द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों के हाथ में अधिकार देता है. यह 'बिना प्रतिनिधित्व के कोई कराधान नहीं' के सिद्धांत को मानता है. सरकार विधि के अनुमोदन के लिए बजट तैयार कर उसे प्रस्तुत करने के लिए संवैधानिक रूप से बाध्य है. खर्च पर विधायी नियंत्रण, कराधान पर विधायी विशेषाधिकार और वित्तीय मामलों में कार्यकारी पहल संसदीय वित्त नियंत्रण प्रणाली के कुछ मौलिक सिद्धांत हैं.
भारत के संविधान में इन सिद्धांतों को शामिल करने के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं. उदाहरण के लिए अनुच्छेद 265 के अनुसार, 'कानूनी प्रमाण के अलावा कोई भी कर नहीं लगाया या लिया जाएगा' और अनुच्छेद 266 कहता है कि विधि की आज्ञा के बिना कोई खर्च नहीं किया जा सकता है. 

2. अनुदान की मांग
बजट में उल्लिखित खर्च के अनुमान पर लोकसभा में मतदान कराना आपेक्षित है. ये अनुमान अनुदानों की मांग के रूप में होते हैं. अनुदानों की इन मांगों को मंत्रालय द्वारा व्यवस्थित किया जाता है और प्रत्येक प्रमुख सेवा के लिए अलग मांग प्रस्तुत किया जाता है. प्रत्येक मांग ग्राफ में पहले कुल अनुदान का कथन और फिर विस्तृत अनुमान को अलग– अलग घटकों में बांटा जाता है.
बजट किस प्रकार प्रस्तुत किया जाता है?
भारत में संसद में बजट प्रस्तुत करने की तारीख राष्ट्रपति निर्धारित करते हैं. वित्त मंत्री का बजट भाषण दो हिस्सों में बंटा होता है. पहला भाग देश के आम आर्थिक सर्वेक्षण के बारे में होता है जबकि दूसरा भाग कराधान प्रस्तावों के बारे में. केंद्रीय बजट वित्त मंत्री द्वारा लोक सभ में प्रस्तुत किया जाता है. वित्त मंत्री बजट शुरु करने के लिए भाषण देते हैं. 

बजट के अन्य दस्तावेज क्या हैं?
'वार्षिक वित्तीय कथन (Annual Financial Statement)' के अलावा सरकार केंद्रीय बजट में निम्नलिखित दस्तावेज प्रस्तुत करती है
1. एक व्याख्यात्मक ज्ञापन होता है जिसमें वर्तमान वर्ष और अगले वर्ष के दौरान खर्च और प्राप्तियों की प्रकृति एवं दो वर्षों के अनुमान में भिन्नता के कारण का संक्षेप में विवरण होता है.
2. बुक्स ऑफ डिमांड्स (Books of Demands) जिसमें मंत्रालय–वार प्रावधान होते हैं और प्रत्येक विभाग के लिए अलग मांग और मंत्रालय के काम का विवरण होता है.
3. वित्त विधेयक जो सरकार द्वारा प्रस्तावित कराधान उपायों के बारे में होता है, को बजट प्रस्तुत किए जाने के तुरंत बाद प्रस्तुत किया जाता है. विधेयक के प्रावधानों और देश के वित्त पर उसके प्रभाव की व्याख्या करने वाला एक ज्ञापन भी वित्त विधेयक के साथ प्रस्तुत किया जाता है. हम वित्त विधेयक को नीचे विस्तार से बताएंगे.

बजट प्रस्तुत करने के बाद क्या होता है?
लेखानुदान (Vote on Account)
बजट प्रस्तुत किए जाने के कुछ दिनों के बाद बजट पर चर्चा होती है. संसद नए वित्त वर्ष के शुरु होने से पहले पूरे बजट पर मतदान नहीं कर सकता. यह सरकार के निपटान के लिए पर्याप्त वित्त रखने की आवश्यकता पैदा करता है ताकि सरकार देश का प्रशासन चला सके. इसलिए लेखानुदान (Vote on Account) नाम से एक विशेष प्रावधान किया गया है जिसके जरिए सरकार को वर्ष के बाकी बचे हिस्से के लिए विभिन्न मदों में खर्च के लिए पर्याप्त धन मिल सके. 

संसद में बजट विश्लेषण
आम बजट और रेलवे बजट, दोनों ही पर आम चर्चा के बाद सदन निश्चित काल के लिए स्थगित कर दिया जाता है. इस अवधि में रेलवे समेत विभिन्न विभागों/ मंत्रालयों के अनुदानों की मांग पर संबंधित स्थायी समिति (नियम 331जी) द्वारा विचार किया जाता है. ये समितियां बिना अतिरिक्त समय की मांग किए निर्धारित अवधि के भीतर सदन में अपनी रिपोर्ट बनाने की जिम्मेदार होती हैं. स्थायी समिति में 45 सदस्य होते हैं, लोकसभा से 30 और राज्य सभा से 15. स्थायी समितियों द्वारा सदन में रिपोर्ट प्रस्तुत किए जाने के बाद सदन भिन्न भिन्न मंत्रालयों के अनुदानों की मांग पर चर्चा और मतदान की प्रक्रिया पर आगे बढ़ता है. स्पीकर सदन के नेता के परामर्श से वोटिंग ऑफ डिमांड एवं अनुदानों के लिए चर्चा हेतु समय आवंटित करते हैं. अंतिम दिन स्पीकर सभी बकाया मांगों को सदन के मतदान के लिए रख देते हैं. इसे आमतौर पर 'गिलटीन– guillotine' कहा जाता है.
   लोकसभा को किसी भी मांग को स्वीकार करने या खारिज करने या सरकार द्वारा अनुदान की धनराशि को कम करने का अधिकार दिया गया है. बजट पर राज्य सभा में सिर्फ आम चर्चा होती है. इसके पास अनुदानों की मांग पर मतदान करने का अधिकार नहीं होता. चर्चा के दौरान दोनों ही सदनों के सदस्यों के पास बजटीय प्रावधानों की आलोचना करने का पूरा अवसर होता है. साथ ही उनके पास देश की वित्तीय स्थिति में सुधार हेतु सुझाव देने का भी अवसर होता है.
बजट के बाद कौन से विधेयक/ बिल अनिवार्य हैं? 

1. विनियोग विधेयक (Appropriation Bill) 
बजट प्रस्तावों पर चर्चा एवं अनुदानों की मांग पर मतदान के पूरा होने के बाद सरकार विनियोग विधेयक प्रस्तुत करती है. विनियोग विधेयक का उद्देश्य भारत की संचित निधि से सरकार को खर्च करने का अधिकार प्रदान करना होता है. इस विधेयक को पारित करने की प्रक्रिया अन्य धन विधेयकों के जैसी ही होती है. 

2. वित्त विधेयक 
लोक सभा में आम बजट के प्रस्तुत किए जाने के तुरंत बाद  प्रस्तुत किए जाने वाले वित्त विधेयक का उद्देश्य सरकार के कराधान प्रस्तावों को प्रभावी बनाना होता है. वित्त विधेयक पर विचार किया जाता है और विनियोग विधेयक के बाद इसे पारित किया जाता है. कर का अनंतिम संग्रह अधिनियम के तहत प्रस्तुत किए जाने वाले विधेयक वाले दिन के समाप्त होने पर विधेयक में नए शुल्कों को लगाने और एकत्र करने संबंधि कुछ प्रावधान तत्काल प्रभावी हो जाते हैं. संसद द्वारा प्रस्तुत किए जाने के 75 दिनों के भीतर वित्त विधेयक को जरूर पारित कर लिया जाना चाहिए.

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